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अहिंसा परमो धर्म:

आज से नही आज़ादी के पहले से ही एक उक्ति या श्लोक बहुत लोकप्रिय होता जा रहा है। परंतु यह किस तह तक पूर्ण है यह सत्य लुप्त हो गया है । न ही वह आज की इस घोर कलियुगी समाज पर चरितार्थ होता है न ही लोगो की मानसिकता पर परिवर्तन आता है। बस लोग अपने मन की शांति और बातो की उपयुक्तता को बढ़ाने के लिए उसका उपयोग करते हैं।  आपने भी अपने जीवन में बहुत बार सुना होगा "अहिंसा परमो धर्म: " । महात्मा गांधी ने भी इस उक्ति का खूब उपयोग किया है। इस उक्ति को बोलते समय लोगो के मानसपटल पर अधिकतर महात्मा गांधी का ही चित्र उभरता है।परंतु उन्होंने भी न जाने क्यों इसे पूरा नही कहा । शायद उन्होंने पूरा कहना उचित नही समझा होगा।इसका पूर्ण रूप कुछ इस तरह से है---                     अहिंसा परमो धर्म:                            धर्म हिंसा तदैव च। अर्थात_ अहिंसा परम धर्म है परन्तु धर्म की रक्षा करने के लिए हिंसा सर्वश्रेष्ठ धर्म।